कवि, पत्रकार, फिर राजनेताः हर रोल में धाक जमाई बाजपेयी ने 

कवि, पत्रकार, फिर राजनेताः हर रोल में धाक जमाई बाजपेयी ने 
स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई शुरुआत, बीजेपी का उदारवादी चेहरा
कुल 12 बार बने सांसद, 1996 में पहली बार बने प्रधानमंत्री

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हालात अब भी नाजुक बनी हुई है. उन्हें फुल लाइफ सपोर्ट पर रखा गया है. बता दें, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने बुधवार को देर रात प्रेस रिलीज जारी कर बताया था उनकी हालत पिछले 24 घंटों में ज्यादा बिगड़ गई है. वहीं थोड़ी देर में एम्स की ओर से वाजपेयी का नया हेल्थ बुलेटिन जारी किया जाएगा


अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे. साल 1950 के दशक की शुरुआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी.

अटल बिहारी वाजपेयी यूं तो भारतीय राजनीतिक पटल पर एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से न केवल व्यापक स्वीकार्यता और सम्मान हासिल किया, बल्कि तमाम बाधाओं को पार करते हुए 90 के दशक में बीजेपी को स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई. यह वाजपेयी के व्यक्तित्व का ही कमाल था कि बीजेपी के साथ उस समय नए सहयोगी दल जुड़ते गए, वो भी तब जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दक्षिणपंथी झुकाव के कारण उस जमाने में बीजेपी को राजनीतिक रूप से अछूत माना जाता था.

स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई शुरुआत

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ. अटल के पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी थे. वाजपेयी का संसदीय अनुभव पांच दशकों से भी अधिक का विस्तार लिए हुए है.

कुल 12 बार बने सांसद

अटल बिहारी वाजपेयी 1951 से भारतीय राजनीति का हिस्सा बने. उन्होंने 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए थे. इसके बाद 1957 में वह सांसद बने. अटल बिहारी वाजपेयी कुल 10 बार लोकसभा के सांसद रहे. वहीं वह दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा के सांसद भी रहे. इस दौरान अटल ने उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली और मध्य प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते. वहीं वह गुजरात से राज्यसभा पहुंचे थे.


बीजेपी का उदारवादी चेहरा

अपनी भाषणकला, मनमोहक मुस्कान, वाणी के ओज, लेखन व विचारधारा के प्रति निष्ठा तथा ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत व पाकिस्तान के मतभेदों को दूर करने की दिशा में प्रभावी पहल करने का श्रेय दिया जाता है. इन्हीं कदमों के कारण ही वह बीजेपी के राष्ट्रवादी राजनीतिक एजेंडे से परे जाकर एक व्यापक फलक के राजनेता के रूप में जाने जाते हैं.

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